अपनी काबिलियत का लोहा मनवाने ओम पुरी की फिल्मो के ये 10 डायलॉग्स है बहुत ही दमदार!

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दोस्तों बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक में दमदार अभिनय कर देश-विदेश में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाने वाले ओम पुरी का जन्मदिन 18 अक्तूबर को होता है। साल 1950 को पटियाला में जन्मे ओमपुरी का पूरा नाम ओम राजेश पुरी था। तीन साल पहले साल 2017 में उनका निधन हो गया था। ओम पुरी जितने शानदार अभिनेता थे उनते ही शानदार उनकी फिल्मों के डायलॉग्स हुआ करते थे। उनके डायलॉग्स बोलने की कला के दर्शक भी मुरीद थे। ऐसे में आज आपको ओम पुरी के कुछ शानदार डायलॉग्स से रूबरू करवाते हैं।

फिल्म- मरते दम तक (1987)

डायलॉग- खून जब बोलता है तो मौत का तांड़व होता है।

फिल्म- नरसिम्हा (1991)।

डायलॉग- मेरा फरमान आज भी इस शहर का कानून है, मैं जब भी करता हूं, इंसाफ ही करता हूं।

फिल्म- मरते दम तक (1987)

डायलॉग- हमारे धंधे में आंसूओं के साथ कोई रिश्ता नहीं होता है।

फिल्म- बाबुल (2006)।

डायलॉग- परंपराओं की लकीरें जब धुंधली पड़ जाती हैं, तो नई लकीरें खींचने से परहेज नहीं करना चाहिए।

फिल्म- कुर्बान (2009)

डायलॉग- यकीन को हमेशा वक्त के पीछे चलना चाहिए, आगे नहीं

फिल्म- ओह माय गॉड (2012)

डायलॉग- मजहब इंसानों के लिए बनता है, मजहब के लिए इंसान नहीं बनते।

फिल्म- चक्रव्यूह (2012)

डायलॉग- मैं ऐसे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता, जो गरीबों की इज्जत करना नहीं जानता।

फिल्म- घायल वंस अगेन (2016)

डायलॉग- जब एक भ्रष्ट आदमी मरता है तो उसकी सत्ता खत्म होती है, और जब एक सच्चा आदमी मरता है तो उसकी सत्ता शुरू होती है।

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